Phirkiyan - Life As I See It

January 11, 2011
The poem sums up my musings about human existence and life.  Life has been compared with spinning tops (hence named, Phirkiyan). 

फिरकियाँ

कौन हूँ मैं? कौन हूँ मैं आखिर?
क्यूँ हूँ मैं यहाँ?
इन लोगों के बीच, जिसे -
वे परिवार कहते हैं, कुटुंब कहते हैं
रिश्ते नाते कहते हैं, सगे सम्बन्धी कहते हैं.

मेरी ज़िन्दगी से जुड़े
या फिर कहूँ कि
मुझे अपनी ज़िन्दगी से जोड़े
वो तमाम लोग
मेरे आसपास घूमती अनंत फिरकियों से हैं.
कोई अपनी सरसराती आवाज़ से डराती,
कोई डगमगाती, कभी मेरी ओर झुकती और
कभी दूसरी ओर.

कोई मेरे आस पास चक्कर लगाती,
कुछ मुझ पर अपना स्वामित्व जताती,
कुछ अपना स्नेह बिखरती
मुझे अपने घेरे के मध्य बिंदु में रखती सी हैं.

कोई स्फूर्ति से, सटीक उछालों में चलती
जीवंत फिरकी
बता जाती कि,
जीवन आगे बढ़ने का नाम है.
तो कोई अपनी ही धुरी पर जीवन पर्यंत घूमती
निष्प्राण
केवल  जीने के लिए जीती सी.

जगह बदलती फिरकियाँ
टकराती आपस में, फिर भी
आगे बढ़ती फिरकियाँ,
उछल उछल कर जैसे
अपनी ज़मीन  टटोलती फिरकियाँ,
घूम-घूम कर गोल-गोल ये
ज़मीन पर स्वामित्व जताती फिरकियाँ.

मेरे आसपास सरसराहट हैं
हवा का वेग हैं, सुगंध भी है.
कडवापन भी है
अधिकार भी है, तिरस्कार भी है
आवाजें हैं, गंध है, भावनाएं हैं
कुछ टूटी सी आशाएं हैं,
उन लोगों की
जो कहलाते हैं -
रिश्ते, नाते, सगे सम्बन्धी
जान पहचान और साथी दोस्त.

पर फिर भी नहीं समझ पाई हूँ अब तक
मैं कौन हूँ?
क्यूँ हूँ यहाँ?
इन सब के बीच
इन सब से दूर
इन सब से जुडी हूँ मैं
या मुझे जोड़े हैं यह सब.

यह अनंत फिरकियों का संसार हैं
अगणित फिरकियों का कारोबार हैं
ये जीवन.
- RESTLESS
Related Posts with Thumbnails